Sunday, May 17, 2009

Saturday, May 9, 2009

जीवन की आपाधापी में

जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा -
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

Thursday, May 7, 2009

कितना अजब संग्राम है


कितना अजब संग्राम है
हर क्षण पराजय हो रही पर
जीतने का नाम है

इस जन्म की सौगन्ध हम
भूखे लड़े हैं भूख से
तन में अगन मन में अगन
फिर भी जुड़े हैं धूप से
खाई बनाकर
पाटना,
दुख से दुखों को
काटना
कितना निरर्थक काम है

जल की सतह पर सिल गए
हल्की हवा से हिल गए
कीचड़ भरे संसार में
जलजात जैसे खिल गए
जल से न ऊँचे
जा सकें
जल से न नीचे
आ सकें
कितना विवश विश्राम है

कुछ दर्द की गरिमा बढ़े
आँसू पिये हँसते रहे
विद्रोह नगरों से किया
वीरान में बसते रहे
कुंडल कवच के
दान का
या कर्ण के
अभियान का
कितना दुखद परिणाम है

1
-- आनंद शर्मा

Tuesday, May 5, 2009

जब कभी गुजरा जमाना याद आता है,

जब कभी गुजरा जमाना याद आता है,
बना मिटटी का अपना घर पुराना याद आता है।
वो पापा से चवन्नी रोज मिलती जेब खरचे को,
वो अम्मा से मिला एक आध-आना याद आता है।
वो छोटे भाई का लडना,वो जीजी से मिली झिङकी,
शाम को फिर भूल जाना याद आता है।
वो घर के सामने की अधखुली खिङकी अभी भी है,
वहाँ पर छिप कर किसी का मुस्कुराना याद आता ह

Sunday, May 3, 2009

साठ बरिस बीतल

साठ बरिस बीतल

डा॰ अशोक द्विवेदी

 

साठ बरिस बीतल
अब्बो से कुछु खयाल करीं.

 

मत खोजीं रगरा-झगरा
मत जीयल काल करीं.
साठ बरिस बीतल
अब्बो से कुछु खयाल करीं.

 

नोंच-चोंथ के खा गइनी सब
कुछऊ ना बाँचल.
डर से रउरा पटा गइल सब
ना बूझल-जाँचल.
पिण्ड छोड़ दीं अब्बो से
मत अँखिया लाल करीं.

 

जतना जुरल, न आँटल ओमे
जुटल न लुग्गा-लत्ता.
हमनी खातिर सबुर के थरिया
रउरा खातिर सत्ता.
बकरी बनल लोग मिमियाता
रोज हलाल करीं.

 

डाँड़-मेंड़ से नाद चरन ले
अनखुन ए सरकार.
महुआ, इमली, आम न चाहीं
सुबहित रहे दुआर.
अझुरावल रउरे, सझुराईं
मत बेहाल करीं.

 

साठ बरिस बीतल
अब्बो से कुछु खयाल करीं!

एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं

एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं, मैं..
खुशी हो या गम, बस मुस्कुराना चाह्ता हूं, मैं..
दोस्तॊं से दोस्ती तो हर कोई निभाता है..
दुश्मनों को भी अपना दोस्त बनाना चाहता हूं, मैं..

जो हम उडे ऊचाई पे अकेले, तो क्या नया किया..
साथ मे हर किसी के पंख फ़ैलाना चाह्ता हूं, मैं..

वोह सोचते हैं कि मैं अकेला हूं उन्के बिना..
तन्हाई साथ है मेरे, इतना बताना चाह्ता हूं..

ए खुदा, तमन्ना बस इतनी सी है.. कबूल करना..
मुस्कुराते हुए ही तेरे पास आना चाह्ता हूं, मैं..

बस खुशी हो हर पल, और मेहकें येह गुल्शन सारा "अभी"..
हर किसी के गम को, अपना बनाना चाह्ता हूं, मैं..

एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं, मैं..
खुशी हो या गम, बस मुस्कुराना चाह्ता हूं, मैं***