Thursday, May 7, 2009

कितना अजब संग्राम है


कितना अजब संग्राम है
हर क्षण पराजय हो रही पर
जीतने का नाम है

इस जन्म की सौगन्ध हम
भूखे लड़े हैं भूख से
तन में अगन मन में अगन
फिर भी जुड़े हैं धूप से
खाई बनाकर
पाटना,
दुख से दुखों को
काटना
कितना निरर्थक काम है

जल की सतह पर सिल गए
हल्की हवा से हिल गए
कीचड़ भरे संसार में
जलजात जैसे खिल गए
जल से न ऊँचे
जा सकें
जल से न नीचे
आ सकें
कितना विवश विश्राम है

कुछ दर्द की गरिमा बढ़े
आँसू पिये हँसते रहे
विद्रोह नगरों से किया
वीरान में बसते रहे
कुंडल कवच के
दान का
या कर्ण के
अभियान का
कितना दुखद परिणाम है

1
-- आनंद शर्मा

9 comments:

  1. Behad sundar rachnaa hai...isee virodhabhaas kaa naam jeeven hai, haina?
    snhe aur aadar sahit
    shama

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  2. बहुत सुन्दर रचना.

    चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.......भविष्य के लिये ढेर सारी शुभकामनायें.

    गुलमोहर का फूल

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  3. स्वागत है...शुभकामनायें.

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  4. हिंदी ब्लॉग की दुनिया में आपका तहेदिल से स्वागत है....

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  5. बहुत सुन्दर लिखा है। बधाई स्वीकारें। मेरे ब्लोग पर आने की जहमत उठाएं। शुभकामनाएं।

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  6. बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

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  7. bahut hi achhi post k liye badhai.........

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